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हिमाचल के किसान अनुसंधान से कर रहे हैं विलुप्त हो रहे हिमालयी जड़ी-बूटी ‘कुटकी’ की सतत खेती

हिमाचल के किसान अनुसंधान से कर रहे हैं विलुप्त हो रहे हिमालयी जड़ी-बूटी ‘कुटकी’ की सतत खेती

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D/DNA News Desk 24 जुलाई 2026, 00:11 IST
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हिमाचल के किसान अनुसंधान से कर रहे हैं विलुप्त हो रहे हिमालयी जड़ी-बूटी ‘कुटकी’ की सतत खेती

शिमला, हिमाचल प्रदेश – हिमाचल प्रदेश के किसानों ने एक नई तकनीक अपनाकर हिमालयी जड़ी-बूटी ‘कुटकी’ की सतत खेती को सफल बनाया है। यह जड़ी-बूटी, जिसे IUCN ने लुप्तप्राय सूची में शामिल किया है, अब एक स्थायी आर्थिक संसाधन के रूप में उभर रही है। शोधकर्ताओं द्वारा विकसित स्टोलोन आधारित कटाई विधि के कारण किसानों को खेती में नई समृद्धि मिल रही है, साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी मदद मिल रही है।

कुटकी एक प्रमुख औषधीय जड़ी-बूटी है, जिसका प्रयोग आयुर्वेद एवं पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में काफी बड़े पैमाने पर किया जाता है। अत्यधिक शिकार और प्राकृतिक आपदाओं के कारण इसकी संख्या लगातार घट रही थी। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए स्थानीय कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों ने इस की खेती के लिए स्टोलोन आधारित तकनीक विकसित की।

इस तकनीक के अंतर्गत पौधों के भूमिगत स्टोलोन से नए पौधे उगाए जाते हैं, जिससे जड़ी-बूटी के उत्पादन में वृद्धि होती है, साथ ही जमीन की जड़े भी क्षतिग्रस्त नहीं होती हैं। इससे जड़ी-बूटी के प्राकृतिक आवासों में अनावश्यक तोड़फोड़ से बचा जा सकता है और स्थायी संरक्षण सुनिश्चित होता है।

हिमाचल प्रदेश के कई किसानों ने इस तकनीक को अपनाना शुरू कर दिया है, जिससे उनकी आय के नए स्रोत खुले हैं। किसान केंद्रों पर प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है ताकि व्यापक पैमाने पर इस विधि को अपनाया जा सके। इस खेती की बढ़ती लोकप्रियता से क्षेत्र में रोजगार भी बेहतर हुआ है।

स्थानीय प्रशासन भी इस पहल का समर्थन कर रहा है। वन विभाग और कृषि विभाग ने मिलकर किसानों को सब्सिडी एवं सहायता प्रदान करने की योजना बनाई है, ताकि वे प्राकृतिक जड़ी-बूटी संरक्षण और उत्पादन दोनों में सफलता प्राप्त कर सकें। यह प्रयास न केवल आर्थिक विकास को बढ़ावा देगा, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को भी स्थिर बनाए रखेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘कुटकी’ जैसी औषधीय जड़ी-बूटियों की सतत खेती हिमालय के जैव विविधता को संरक्षित करने का एक प्रभावी माध्यम है। साथ ही, यह किसानों के जीवन स्तर में सुधार करने और स्थानीय पारंपरिक ज्ञान को बढ़ावा देने में भी मदद करता है।

इस सफल मॉडल को अन्य हिमालयी क्षेत्रों में भी अपनाने की योजना बनाई जा रही है ताकि पूरी क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचे। यह पहल हिमाचल प्रदेश की कृषि प्रगति और पर्यावरण संरक्षण की मिसाल बनी हुई है।

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