नई दिल्ली, दिल्ली – विश्व नो टॉबैको डे के अवसर पर तंबाकू नियंत्रण को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया। यह बैठक सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों को तंबाकू उद्योग के दखलंदाजी से बचाने के मकसद से आयोजित की गई थी। कैंसर संस्थान के तत्वावधान में यह राज्य स्तरीय परामर्श हुआ, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ, नीति निर्माता और स्वास्थ्य कार्यकर्ता शामिल हुए।
बैठक में मुख्य रूप से यह चर्चा हुई कि किस प्रकार तंबाकू उद्योग अपने प्रभाव और दबाव के माध्यम से सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश करता है। विशेषज्ञों ने कहा कि तंबाकू का सेवन न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि यह राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी वित्तीय बोझ भी डालता है।
इस दौरान, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने तंबाकू नियंत्रण नियमों को सशक्त बनाने तथा उद्योग के दबावों से नीति निर्माताओं की रक्षा के लिए रणनीतियों पर विचार विमर्श किया। उन्होंने सुझाव दिया कि जागरूकता कार्यक्रमों के जरिए आम जनता को तंबाकू के दुष्प्रभावों के बारे में सचेत करना आवश्यक है। साथ ही, तंबाकू उत्पादों पर अधिक कर व कड़े नियम लगाए जाएं ताकि उनकी मांग में कमी लाई जा सके।
शामिल सामूहिक प्रतिनिधियों ने सरकार से भी अपील की कि उसे विश्व स्वास्थ्य संगठन के फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल (FCTC) के दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन करना चाहिए। तंबाकू उद्योग की हिंटिंग और राजनीतिक दबावों के खिलाफ मजबूत कानूनी और नीतिगत कदम उठाए जाने जरूरी हैं।
इस अवसर पर एक विशेषज्ञ ने कहा, “तंबाकू मुक्त भारत की दिशा में यह कदम एक महत्वपूर्ण पहल है। यदि हम समय रहते तंबाकू उद्योग के प्रभाव को नियंत्रित नहीं करते हैं, तो आने वाली पीढ़ियों का स्वास्थ्य खतरे में पढ़ जाएगा।”
बैठक में यह भी तय किया गया कि आगे भी इस तरह के परामर्श समय-समय पर आयोजित किए जाएंगे ताकि नीति निर्माण में विशेषज्ञों का योगदान बना रहे और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियां प्रभावी ढंग से लागू हो सकें।
इस प्रकार, विश्व नो टॉबैको डे के संदर्भ में आयोजित यह परामर्श न केवल तंबाकू नियंत्रण पर सरकार का दृढ़ संकल्प दर्शाता है, बल्कि यह सामाजिक स्वास्थ्य सुधार के लिए सक्रिय कदम भी है।











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