फरीदाबाद/चंडीगढ़ (धर्मराज / तरुण अरोड़ा)
अरावली की पहाड़ियों की गोद में बसे एक शांत जलकुंड से सूरजकुंड की कहानी शुरू होती है। कहा जाता है कि 10वीं शताब्दी में तोमर वंश के राजा सूरजपाल ने सूर्य उपासना और जल संरक्षण के उद्देश्य से इस कुंड का निर्माण कराया। सूरज यानी सूर्य और कुंड यानी जलाशय—इसी से इस ऐतिहासिक स्थल का नाम सूरजकुंड पड़ा।
कभी यह स्थान साधना, प्रकृति और जल-संरक्षण का प्रतीक माना जाता था। समय बदला और इसी ऐतिहासिक धरोहर को नई पहचान देने के लिए 1987 में हरियाणा पर्यटन विभाग द्वारा सूरजकुंड शिल्प मेले की शुरुआत की गई। उद्देश्य स्पष्ट था—देश के कोने-कोने से आने वाले कारीगरों को एक ऐसा मंच देना, जहां उनकी मेहनत, कला और संस्कृति सीधे आम लोगों तक पहुंच सके।
शुरुआती वर्षों में सूरजकुंड मेला वास्तव में एक सांस्कृतिक उत्सव हुआ करता था। मिट्टी, लकड़ी, कपड़ा और धातु से बने शिल्प हर स्टॉल पर भारत की आत्मा को दर्शाते थे। विदेशी सैलानी भी बड़ी संख्या में यहां आते थे और धीरे-धीरे यह मेला अंतरराष्ट्रीय पहचान बन गया।
लेकिन वक्त के साथ तस्वीर बदलती चली गई।
आज वही सूरजकुंड मेला, जो कभी संस्कृति का उत्सव माना जाता था, अब सवालों के घेरे में खड़ा दिखाई देता है। करोड़ों रुपये के बजट, भारी-भरकम प्रचार और वीआईपी उद्घाटन के बावजूद मेले की चमक फीकी पड़ती नजर आ रही है। कारीगरों का कहना है कि बिक्री न के बराबर हो रही है, स्टॉल शुल्क लगातार बढ़ता जा रहा है और सुविधाएं घटती जा रही हैं।
पर्यटक महंगे टिकट, अव्यवस्थित पार्किंग और सुरक्षा में खामियों से परेशान हैं। मेले में अब कला और संस्कृति से ज्यादा ठेकेदारी, विज्ञापन और खर्च की होड़ दिखाई देती है। कई सामाजिक संगठनों का आरोप है कि यह मेला अब संस्कृति के संरक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि सरकारी धन बर्बाद करने की जगह बनकर रह गया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
क्या सूरजकुंड मेला अपने मूल उद्देश्य से भटक चुका है?
और क्या यह मेला अब “अंतरराष्ट्रीय शिल्प उत्सव” न रहकर एक फ्लॉप आयोजन बनता जा रहा











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