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अगर पास बने थे, तो छपे क्यों नहीं—और अगर नहीं छपे, तो सच क्या है?”
प्रिंटर मौजूद, ठेका तय—फिर भी पत्रकारों तक नहीं पहुँचे पास, ‘अदृश्य सिस्टम’ बेनका
फरीदाबाद (धर्मराज/तरुण अरोड़ा)सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला-2026 में प्रेस/मीडिया पास को लेकर अब एक नया और गंभीर विरोधाभास सामने आया है। जनसंपर्क विभाग (DIPRO) कार्यालय का दावा है कि पास तैयार (बने) तो थे, लेकिन वास्तविक रूप से उनका प्रिंट नहीं हुआ। यही दावा अब पूरे प्रशासनिक तंत्र पर सवाल बनकर खड़ा हो गया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पास “बन चुके थे”, तो वे छपे क्यों नहीं? और यदि नहीं छपे, तो दोष किसका है—DIPRO का या प्रिंटर का?
प्रिंटिंग का ठेका किसे मिला?
सूत्रों के अनुसार, प्रेस कार्ड/पास की प्रिंटिंग के लिए एक प्रिंटर/प्रिंटिंग एजेंसी को ठेका दिया गया था। यदि ऐसा है, तो फिर यह स्पष्ट होना चाहिए कि किस एजेंसी को प्रिंटिंग का कार्य सौंपा गया? कितने पास प्रिंट होने थे? कितने वास्तव में प्रिंट हुए? और कितनों की प्रिंटिंग रोक दी गई? लेकिन इन बिंदुओं पर अब तक कोई सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है।
DIPRO कार्यालय नहीं चाहता था प्रिंट या प्रिंटर ने किया इंकार?
इस पूरे मामले में दो संभावनाएँ उभरती हैं
- DIPRO कार्यालय ने ही प्रिंटिंग आगे नहीं बढ़ाई। या
- 2️⃣ प्रिंटर ने किसी कारणवश प्रिंट करने से मना कर दिया।
यदि दूसरी स्थिति सही है, तो सवाल उठता है कि क्या भुगतान रोका गया? क्या आदेश लिखित रूप में नहीं थे? या फिर प्रिंटिंग जानबूझकर टाल दी गई? “पास बने थे” — यह दावा किस रिकॉर्ड पर? यदि पास वास्तव में तैयार थे, तो उनके डिज़ाइन डेटा फाइल अप्रूवल और प्रिंट कमांड का कोई न कोई रिकॉर्ड अवश्य होना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना रिकॉर्ड के “पास बन चुके थे” कहना केवल बयान हो सकता है, प्रशासनिक तथ्य नहीं।
पत्रकारों के साथ प्रयोग?
इस पूरे घटनाक्रम का असर सीधे पत्रकारों पर पड़ा। कई पत्रकारों के आवेदन स्वीकृत बताए गए, लेकिन उन्हें हाथ में पास कभी मिला ही नहीं। इससे यह आशंका और गहराती है कि कहीं पास की प्रक्रिया जानबूझकर अधूरी छोड़कर चयनात्मक प्रवेश का रास्ता तो नहीं बनाया गया?
पूरा खेल क्या है? अब सवाल सीधा है—
क्या पास बनाकर भी छापे नहीं गए? क्या प्रिंटिंग को जानबूझकर रोका गया? क्या ठेके और भुगतान से बचने के लिए प्रक्रिया अधूरी रखी गई? या फिर यह सब एक नियंत्रित व्यवस्था का हिस्सा था? इन सवालों के जवाब केवल बयान से नहीं, फाइल, बिल, वर्क ऑर्डर और रिकॉर्ड से ही मिल सकते हैं।
जिसके लिए प्रभावित पत्रकार आज करेंगे जन सूचना अधिनियम के अंतर्गत आवेदन
क्या लिखा आवेदन में ओर कहा किया दायर जाने अगले अंक में….











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